Thursday, March 26, 2026
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बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद

बदरीविशाल की जयकारों की गूंज, हजारों श्रद्धालु रहे मौजूद
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा 2025 का समापन

चमोली: विश्व प्रसिद्ध चारधाम में शुमार बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के बंद कर दिए हैं. कपाट आज दोपहर 2:56 बजे विधि-विधान से बंद कर दिए गए. करीब 5 हजार श्रद्धालु कपाट बंदी समारोह के साक्षी बने. वहीं, इस मौके पर बदरी विशाल के दरबार को फूलों से सजाया गया. जिससे धाम की छटा देखते ही बन रही थी.

बता दें कि बदरीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए आज दोपहर 2 बजकर 56 मिनट पर बंद हो गए हैं. श्रद्धालुओं की उपस्थिति में रावल अमरनाथ नंबूदरी ने परंपरागत रीति रिवाज से कपाट बंद किए. इस मौके पर बदरीनाथ धाम को 12 क्विंटल गेंदे के फूलों से सजाया गया था. जबकि, सेना के बैंड की धुन और भगवान बदरी विशाल के जयकारों से धाम गूंज उठा.

भगवान बदरी विशाल को ओढ़ाया गया घृत कंबल: परंपरा के अनुसार, उद्धव और कुबेर की प्रतिमाओं को गर्भगृह से बाहर लाया गया. जबकि, देवी लक्ष्मी को गर्भगृह में विराजमान किया गया. भगवान बदरी विशाल को माणा महिला मंगल दल की ओर से तैयार घृत कंबल ओढ़ाया गया. शीतकालीन प्रवास के दौरान भक्त अब भगवान बदरीनाथ के दर्शन पांडुकेश्वर स्थित योगध्यान बदरी में कर सकेंगे.

16 लाख 60 हजार श्रद्धालुओं ने किए भगवान बदरी विशाल के दर्शन: इसके साथ ही भगवान बदरी विशाल की स्वयंभू मूर्ति, भगवान उद्धव और कुबेर जी मूर्ति अपने शीतकालीन प्रवास स्थल की ओर रवाना हो गई है. इस बार करीब 16 लाख 60 हजार श्रद्धालुओं ने किए भगवान बदरी विशाल के दर्शन कर पुण्य लाभ कमाया. मान्यता है कि शीतकाल में भगवान बदरी विशाल की पूजा का दायित्व निर्वाहन देवताओं के पास रहता है. ऐसे में देव ऋषि नारद बदरीनाथ की नित्य दैनिक पूजाएं करेंगे.

अब यहां देंगे दर्शन: बता दें कि भगवान बदरी विशाल की मूल शालिग्राम की स्वयंभू मूर्ति को कभी बदरीनाथ से बाहर नहीं निकाला जाता है, लेकिन पूजा के लिए उत्सव मूर्ति (चल विग्रह) को ले जाया जाता है. कपाट बंद होने के बाद भगवान बदरी विशाल की उत्सव मूर्ति को ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) स्थित नृसिंह मंदिर में विराजमान किया जाता है.

शीतकाल के दौरान इसी उत्सव मूर्ति की ज्योतिर्मठ के नृसिंह मंदिर में पूजा होती है. जबकि, भगवान उद्धव और कुबेर जी की मूर्ति पांडुकेश्वर स्थित योगध्यान बदरी मंदिर में विराजते हैं. वहीं, अब बदरीनाथ धाम के कपाट बंद हो गए हैं. जिससे धाम में चहल-पहल खत्म हो गई है. इसके साथ ही बदरीनाथ में सन्नाटा पसर गया है.

बदरीनाथ धाम को कहा जाता है धरती का बैकुंठ: गौर हो कि बदरीनाथ धाम चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित है. जो हिंदुओं के प्रमुख तीर्थ स्थलों में ये एक है. जो भगवान विष्णु को समर्पित है. बदरीनाथ धाम समुद्र तल से 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. जो देश के चारधामों से एक है. इसके अलावा यह छोटे चारधाम (उत्तराखंड के चारधाम) में भी से एक है.

बदरीनाथ धाम को धरती का बैकुंठ भी कहा जाता है. मंदिर परिसर में 15 मूर्तियां मौजूद हैं. इनमें सबसे प्रमुख भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर शालिग्राम की प्रतिमा है. यहां भगवान विष्णु ध्यान मग्न मुद्रा में विराजमान हैं. जबकि, प्रतिमा के बगल में कुबेर, लक्ष्मी और नारायण की मूर्तियां है.

BADRINATH TEMPLE

बदरीधाम में बदरी नारायण के पांच स्वरूपों की पूजा-अर्चना होती है. भगवान विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से भी जाना जाता है. बदरीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी चमोली में स्थित हैं. बदरीनाथ पांचों मंदिरों में से मुख्य है. इसके अलावा योगध्यान बद्री, भविष्य बद्री, वृद्ध बद्री, आदिबद्री हैं.

दक्षिण भारत के होते हैं बदरीनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी: कहा जाता है कि भगवान विष्णु को समर्पित बदरीनाथ मंदिर आदि गुरु शंकराचार्य ने चारों धाम में से एक के रूप में स्थापित किया था. यह मंदिर 3 भागों में विभाजित है. जिसमें गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभामंडप. शंकराचार्य व्यवस्था के मुताबिक, बदरीनाथ मंदिर का मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य से आते हैं.

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